-गांव में पशुओं की बीमारी को ठीक करने के लिए इस तरह किया जाएगा उपक्रम
फरह। पीडीयू समाचार
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महुअन में आज निकाला जाने वाला खप्पर मां काली के खप्पर की याद दिलाएगा। यानी शुक्रवार की रात में ग्रामीण जलती लौ के साथ खप्पर को घर घर ले जाएंगे। इससे बीमारी पशुओं के इलाज का दावा किया जाता रहा है। यूं गांवों में खप्पर निकाले जाने की परम्परा पुरातन है। लेकिन बीच में इ परम्परागत प्रथा को पुनर्जीवित कर ग्रामीणों का मानना है कि इससे उनके बीमार पशुओं का इलाज हो जाता है।

गांवों में मुददतों से पालतू पशुओं के बीमार होने पर खप्पर निकाले जाने की प्रथा रही है। हालांकि पूर्व में इसको हर साल निकाला जाता था। बीच में ग्रामीणों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। बर्षात के बाद गांव में अधिकांश पशु बीमार पडे हैं। किसी को खुरपका रोग हो गया है तो कोई गलघोंटू रोग का शिकार है। राजकीय पशुअस्पताल की टीम गांव में कभी झांक कर नहीं देखती है। चिकित्सीय सेवाओं के अभाव के कारण ग्रामीण खुद खप्पर निकाले जाने को मजबूर हैं। इसके लिए ग्रामीणों ने पूरी तैयारी कर ली है। ग्रामीण सोनू और नेत्रपाल इस बार खप्पर को धारण करेंगे। इसके तहत मिटटी के बर्तन का एक खप्पर लिया जाता है। इसमें आग जलाई जाती है। आग में गंधक सहित तमाम औषधियां का मिश्रण भी डाला जाता है। इसके बाद जलती लौ के साथ खप्पर डोर टू डोर घुमाया जाता है।
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खप्पर का भी होता है पूरा प्रोटोकाल तैयार
खप्पर को ग्रामीण यूं हीं नहीं निकाल लेते। इसके लिए बाकायदा पूरा प्रोटोकाल तैयार होता है। सुवह से ही ग्रामीण महिलाओं को नलों और कूओं से पानी लाने से प्रतिबंधित कर दिया जाता है। घरों में चूल्हे नहीं जलाए जाते हैं। रोटी भी तैयार नहीं की जाती है।
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ग््रामीण घूरे लाल की तीन भैंस बीमारी की भेंट चढीं
महुअन में ज्यादातर पशु बीमारी के चंगुल में हैं। घर घर बीमार पशु होने से पशुपालक किसानों की चिंता बढना लाजिमी है। घुर्रूका रोग के कारण ग्रामीण घूरे लाल की तीन भैंसे कालकवलित हो गई हैं। ग्रामीण ने बताया कि उसकी भैंसे बहुत कीमती थीं।






