न कच्चे नीम की निवौरी, न आम का बौर और न वे झूले – अब झूलते हुए प्रेयसी नहीं बुलाती अपने प्रियतम को

भरत लाल गोयल, चीफ एडीटर पीडीयू समाचार
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प्रसिद्व कवि कालिदास ने अपनी रचना कुमारसम्भव में सावन के बादलों का मनमोहक वर्णन किया है। लोकपरम्परा में सावन की मल्हारें मन को उद्वेलित कर देने वाली होती थी किसी विरहणी के लिए।
सावन का महीना प्रियाप्रियतम के विरह को व्यक्त करने वाला रहा है। मायके मे अमुआ की डार पर झूलते हुए विरहणी अतीत की यादों में खो जाती थी। उन सुखद स्मृतियों को सजीव करने के लिए कभी वह बादलों के माध्यम से संदेशा भेजती थी तो कभी कबूतरों के जरिए। लेकिन लग रहा है कि समय के साथ पुरातन परम्पराओं की धार मद्विम होती जा रही है। रक्षा बंधन का पर्व बिलकुल दहलीज पर है, पर लोगों की उदासी और व्यस्तता से नहीं लग रहा कि रक्षा का पर्व बस एक कदम पर है। पीडीयू टीम ने देखा गांवों में त्यौहार की रंगत एक दिन पूर्व तो कोई खास उल्लास नहीं दिखा ग्रामीणों में। गांवों में लोग जगह जगह ताश के पत्तों में मशगूल थे। कहीं किसी पेड या वृक्ष पर कोई झूला नहीं पडा था। वरन पेड के नीचे ताश के पत्ते जरूर खेले जा रहे थे। कोई राग या मल्हारों की टेर भी नहीं सुनाई नहीं दे रही थी। बाजारों में भी सन्नाटा पसरा पडा था। हा, महिला बाजारों में अवश्य चहलकदमी सी दिख रही थी। मथुरा में भी पिछले साल की अपेक्षा भीड कम दिखी। फरह, गोबर्धन, बल्देव और छाता कोसीकला के भी ये ही हालात नजर आए। एक ग्रामीण ने बताया कि का करैं, साब। महंगाई है। अब पुराने है गए हैं सब रिवाज। हाल यह था कि जहां पहले एक एक माह पूर्व महिलाएं अपने मायके आ जाती थी। अब वे एक दिन पूर्व भी आना लाजिमी नहीं समझतीं। शनिवार को गांवों में देखा गया कि बहनों का इंतजार कर रहे भाई दुखी मन से बैठे थे। क्यों कि उनकी बहनें ससुराल से नहीं आ सकी थीं। वे सम्भवत रविवार के दि नही मायके आ सकेंगी। त्यौहारों के प्रति परिवर्तित दृष्टिकोण क्या हमारी स्वस्थ्य सांस्कृतिक धरोहर के लिए अच्छा है, यह तो समय के गर्त में है, लेकिन लोगों की सेच अब हटकर बनती जा रही है।

 

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