निजी स्कूलों को मान्यता दे ही दी, इनके टीचर्स को टीचर्स नहीं मानते अधिकारी

शिक्षा के कंटक-1
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-अधिकारियों की तानाशाही और मनमर्जी से तमाम योग्य अभ्यर्थी रह जाते हैं तमाम पदों की भर्ती से वंचित


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न्यूजटीम, पीडीयू समाचार चैनल
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लखनऊ
प्रदेश में रेबडी की तरह निजी स्कूलों को मान्यता तो अधिकारी दे बैठे, अब उनके अध्यापकों को अध्यापक मानने में संकेाच कियाजा रहा हैं। इससे योग्य और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों का दमन हो रहा है। उनको उच्च पदों पर पहुंचने के अवसरों से बंचित होना पड रहा है।
दरअसल शिक्षा विभाग के अधिकारी प्रदेश में इंटर मीडिएट तक हजारों स्कूल कालेजों को मान्यता तो अपनी जांच रिपोर्ट से दिला चुके हैं। लेकिन वह जांच वहीं तक सीमित रही। इसके बाद किसी भी अधिकारी ने इन स्कूलों की तरफ मुडकर नहीं देखा। बाद में इनमें पढाने वाले अध्यापक शिक्षा विभाग के बेसिक शिक्षा अधिकारी या जिला बिधालय निरीक्षक के पास अनुभव प्रमाणपत्र बनवाने पहुंचते हैं तो फिर इतनी प्रक्रियाएं बता दी जाती हैं कि न तो उनको उक्त अध्यापक पूरी कर पाता है और न स्कूल। अंतत कार्यशली अध्यापक को अवसर से बंचित होना पडता है। सवाल यह उठता है कि अधिकारी समय समय पर ऐसे निजी स्कूलों का निरीक्षण और भौतिक सत्यापन क्यों नहीं करते! उक्त स्कूलों में अध्यापक कौन हैं। पढा रहे हैं अथवा नहीं। यह उनके अधिकारन्तर्गत है। हर तीन या छह माह में मौके पर अध्यापकों का सत्यापन करें तो समस्या स्वतं समाप्त हो जाएगी। निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश भी लगेगा। लेकिन अधिकारी अपनी सिरदर्दी से बचने के लिए निजी स्कूलों की तरफ मुखातिब तक नहीं होते। फलत स्कूल संचालक मान्यता के समय योग्ताधारकों के अभिलेख लगाकर मान्यता ले लेते हैं, बाद में अयोग्य व्यक्तिओं या कम पढे लिखे व्यक्तियों से स्कूलों में टीचिंग कराते हैं। जाहिर है कि इससे शिक्षा का स्तर गिरा है और होम परीक्षाओं सहित बोर्ड की परीक्षाओं में नकल की प्रवृत्ति भी बढी हैं। बता दें कि सरकारी स्कूलों से पांच गुना ज्यादा छात्र वर्तमान में प्राइवेट स्कूलों में पढ रहे हैं।
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इन पदों पर जरूरत पडती है अनुभव प्रमाणपत्र की
– प्रदेश सरकार के इंटर या हाईस्कूलों अथवा अन्य राज्यों के सरकारी स्कूला में होने वाली प्रधानाध्यापक अथवा प्रिंसीपल भर्ती में शिक्षण अनुभव मांगा जाता है। ऐसे में इन पदों पर भर्ती में सरकारी स्कूलों के अध्यापक लाभ उठा जाते हैं। जबकि प्राइवेट स्कूलों के अध्यापकों के अवसरों से बंचित होना पडता है। सरकारों को इस संबंध में सहज दिशा निर्देश जारी करने चाहिए। या तो कालेज स्तर का ही अनुभवप्रमाणपत्र मान्य हो, अथवा नियमों में ढील दे कर प्रक्रिया को सरल करे।
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फैक्ट फाइल
– सृजित पदो ंके सापेक्ष कम टीचर्स हैं निजी स्कूलों में
-वेतन के नाम पर दो हजार से दस हजार मिलता है बमुश्किल वेतन
-छात्रों से फीस और प्रक्टिकल के नाम पर प्रबंधन बसूलता है मोटा पैसा
– किताबों और यूनीफार्म के नाम पर अलग से काटी जाती है अभिभावकों की जेब
– हर साल मिलीभगत से करोडों रूपए की स्कालरशिप को भी डकार रहा प्रबंधतंत्र
-निजी स्कूलों के शिक्षकों को आज नहीं मिला बोर्ड परीक्षा डयूटी का पैसा
– पैसा भेजा जाता है बिधालय या कालेज के खाते में

 

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