सूरदास जी ने फरह में की थी साधना, मनाने आए थे गुरु यमुना किनारे टीले पर स्थल को बनाया था साधना स्थल,स्थापित है सूर श्याम कीर्ति मंदिर

वैष्णव संप्रदाय के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे वात्सल्य रस के सम्राट सूरदास

 

यमुना किनारे और श्याम कीर्ति मंदिर पर लगी पट्टिका।

श्रवण शर्मा,डेस्क संपादक

   (डीडीयू न्यूज़,दीनदयाल उपाध्याय न्यूज़)

ब्रज, विशेष कर मथुरा जनपद संत-महंत, गायक-साधकों की साधना स्थली रहा है। यहां ऐसे संत-महंत और साधक हुए, जिनसे मथुरा की पहचान जुड़ी है। यह पहचान आज इतिहास में दर्ज हैं। ऐसे ही महापुरुषों में भक्ति काल के प्रमुख कवि, कृष्ण लीलाओं का कविताओं से वर्णन करने वाले, वात्सल्य रस के सम्राट सूरदास भी शामिल हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

शंकर दास, सेवक

सूरदास जी ने फरह के समीप यमुना किनारे साधना की। साधना के दौरान सूरदास जी का अपने गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य से स्नेही मिलन भी हुआ इस ऐतिहासिक मिलन के साक्ष्य आज भी यमुना किनारे मौजूद हैं। यह बात अलग है कि यह ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल आज अपने उद्धार के लिए सुंदरीकरण का इंतजार कर रहा है।

 

 

बच्चू सिंह, सलेमपुर

भक्ति काल के प्रमुख कवियों में शामिल सूरदास जी को वात्सल्य रस का सम्राट भी कहते हैं। कविताओं से कृष्ण लीला का वर्णन करने वाले सूरदास जी अपने जीवन काल में फरह से करीब साढ़े तीन किलोमीटर दूर यमुना किनारे साधना को आए और काफी समय तक इस स्थान को अपनी साधना स्थली भी बनाया। इतिहास के पन्नों में यह स्थान आज सूर्य श्याम कीर्ति मंदिर- श्री वल्लभ सूर मिलन स्थल के नाम से दर्ज है। पौराणिक साक्ष्य इस स्थल की महिमा का बखान करते हैं। यमुना किनारे मौजूद इस स्थान को अब अस्तल के नाम से जाना जाता है।

♦मनाने आए थे गुरु
सूरदास जी किसी बात को लेकर नाराज हुए तो वह इस स्थान पर साधना को चले आए। पुष्ट मार्ग के संस्थापक और वैष्णव संप्रदाय की स्थापना करने वाले महाप्रभु वल्लभाचार्य को सूरदास जी के नाराज होकर चले जाने की जानकारी मिली तो वह इस स्थान पर अपने शिष्य को मनाने आए। प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार, शिष्य सूरदास को मनाने के लिए कई दिन तक महाप्रभु ने इस स्थल पर डेरा भी डाला था।
बृजेश महाराज ने किया है शोध –
सूरदास जी ने जीवन काल में यमुना किनारे अस्तल पर साधना की। यह ऐतिहासिक प्रमाण करीब 80 साल पहले किए गए शोध से सामने आया। देवकी पीठाधीश्वर स्वामी बृजेश महाराज ने यह शोध किया था, जिनकी मथुरा में बैठक है। शोध के बाद इस स्थान पर सूरदास जी का एक कृति चित्र संगमरमर के पत्थर पर उकेर कर स्थापित कराया गया जो आज भी श्री वल्लभ और सूर मिलन स्थल पर मौजूद है।

अपेक्षित है ऐतिहासिक धार्मिक स्थल –
श्री वल्लभ और सूर मिलन स्थल आज अपेक्षित है। इस स्थान पर कृष्ण कालीन पीलू के पेड़ और अन्य वनस्पति, पौधे मौजूद हैं। टीले पर बसा यह सूर श्याम कीर्ति मंदिर हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है तो अपनी दुर्दशा पर भी आंसू बहता है।

इस स्थान पर साधना करते हुए करीब 28 साल हो गए। यह पौराणिक स्थान है जहां वात्सल्य रस के सम्राट सूरदास जी ने साधना की थी।-शंकर दास, सेवक।

सूरदास जी ने इस स्थान पर साधना की थी, यह शोध मथुरा के देवकी पीठाधीश्वर स्वामी बृजेश महाराज ने किया है, पूर्वजों से यह बात हमने भी सुनी है।बच्चू सिंह,सलेमपुर।

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