हरेकृष्ण गोयल

मांट। पश्चिमी सभ्यता महानगरों और नगरों से होते हुए अब देहात में भी हावी होती दिख रही है।देहात में भी अब विदेशी नस्ल के कुत्ता पालना स्टेट्स सिम्बल बनता जा रहा है। कुछ समय पूर्व तक विदेशी नस्ल के कुत्ता शहरों में महंगी कोठियों या महंगी गाडियों में देखने को मिलते थे।पर अब देहात में इसका शौक चरम सीमा पर है।देहात में कुत्ता पाल कर लोग स्वयं को बाकी से अलग दिखाना चाहता हैं। अकेले मांट कस्बा में ही इन दिनों कई दर्जन विदेशी नस्ल के कुत्ते पल रहे हैं। ज्यादातर कुत्ते दिखावा मात्र हैं विदेशी नस्ल के इन कुत्तों की बात की जाए तो दो चार नस्ल छोड़ कर ज्यादातर मात्र दिखावा हैं,लोग इन्हें सुबह शाम घुमाने ले जाते हैं,तो कुछ लोग शौकिया गाड़ी में घुमाते हैं।कुछ ऐसी नस्ल के कुत्ते देशी कुत्तों से बहुत डरते हैं। विदेशी नस्ल के यह कुत्ते देशी कुत्तों को आते देख किनारा कर लेते हैं। पर कुछ विदेशी कुत्ते ऐसे भी हैं,जो अपने सामने देशी को नहीं टिकने देते हैं।जिसके चलते घरों की रखवाली की बात कह कर महंगे कुत्ते रखना मात्र दिखावा है। कुत्ते को डोगी कहलाना पसंद करते हैं पालतू कुत्तों के स्वामी कुत्ते को कुत्ता कहने से नाराज हो जाते हैं और उन्हें डोगी कहलाना पसंद करते हैं।वहीं शाकाहारी कुत्ते का एक दिन का खाने का खर्चा करीब एक सौ रुपया बैठता है।जबकि कुत्ते के मांसाहारी होने पर यह खर्च तीन गुने तक बढ़ जाता है। एक बात और खास देखने को मिलती है कि जिन लोगों ने इतना प्रेम अपने बच्चों को भी नहीं दिया होगा उससे ज्यादा कुत्तों को देते हैं। वहीं विदेशी नस्ल के कुछ कुत्ते ऐसे भी हैं कि उन्हें रहने के लिए ठंडा माहौल चाहिए,देखने मे कई बार आता है,कि कुत्ता स्वामी तो पंखे से गुजर कर रहा है पर कुत्ते के लिए कूलर की व्यवस्था करनी पड़ती है। हाई ब्रिड कुत्ते रहते हैं बीमार आज कल विदेशी नस्ल के जो भी कुत्ते दिखाई देते हैं,उसमें ज्यादातर हाई ब्रिड है,क्यों कि देश के बाहर से आने वाले कुत्तों पर सरकार ने रोक लगा रखी है। हाई ब्रिड कुत्ते बीमार रहते हैं,और जल्दी मर जाते हैं। विदेशी कुत्तों के शौक ने डॉग मास्टरों का धंधा भी खूब चमका दिया है,ये डॉग मास्टर कुत्ते को ट्रेनिंग के नाम पर हजारों रुपये लेते हैं।






