पी डी यू समाचार
उत्तर प्रदेश:-में लोकसभा चुनाव का मुकाबला कहीं त्रिकोणीय तो कहीं दो तरफा नजर आ रहा है। मोदी के डर से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपनी वर्षों पुरानी दुश्मनी को भूल कर हाथ तो मिला लिया है, लेकिन गठबंधन के बाद भी इन दलों के नेताओं की चिंताएं कम नहीं हुई हैं। खासकर बसपा सुप्रीमो मायावती कुछ ज्यादा ही आशंकित हैं। इसी तरह से पूरे प्रदेश में कमजोर, लेकिन अमेठी−रायबरेली में हमेशा मजबूत नजर आने वाली कांग्रेस भी इन दोनों सीटों पर भाजपा से आमने−सामने के मुकाबले में सहमी−सहमी है। इन दलों के नेताओं के डर की वजह है मतदाताओं का जागरूक हो जाना। अब वह दौर खत्म हो रहा है जब किसी नेता की एक आवाज पर वोटर उसके पक्ष में अपना मन बदल लिया करते थे। स्थिति यह है कि अब यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि समाजवादी वोटर, अखिलेश यादव के कहने पर बसपा या राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी को आंख बंद करके अपना वोट दे ही देंगे। इसी प्रकार बसपा भी इस तरह का कोई दावा नहीं कर सकती है। इन दलों को वोटर इस बात का अहसास पिछले कुछ चुनावों में करा भी चुके हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती तो अक्सर कहती सुनी भी गई हैं कि गठबंधन से उन्हें नुकसान होता है। उनका वोट तो गठबंधन सहयोगी को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन उन्हें इसका फायदा नहीं मिलता है। यह तर्जुबा वह पूर्व में गठबंधन करके हासिल कर चुकी हैं।







