रायबरेली में सोनिया को कोई खतरा नहीं पर अमेठी में कहीं अपनी सीट खो ना बैठें राहुल

पी डी यू समाचार

उत्तर प्रदेश:-में लोकसभा चुनाव का मुकाबला कहीं त्रिकोणीय तो कहीं दो तरफा नजर आ रहा है। मोदी के डर से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपनी वर्षों पुरानी दुश्मनी को भूल कर हाथ तो मिला लिया है, लेकिन गठबंधन के बाद भी इन दलों के नेताओं की चिंताएं कम नहीं हुई हैं। खासकर बसपा सुप्रीमो मायावती कुछ ज्यादा ही आशंकित हैं। इसी तरह से पूरे प्रदेश में कमजोर, लेकिन अमेठी−रायबरेली में हमेशा मजबूत नजर आने वाली कांग्रेस भी इन दोनों सीटों पर भाजपा से आमने−सामने के मुकाबले में सहमी−सहमी है। इन दलों के नेताओं के डर की वजह है मतदाताओं का जागरूक हो जाना। अब वह दौर खत्म हो रहा है जब किसी नेता की एक आवाज पर वोटर उसके पक्ष में अपना मन बदल लिया करते थे। स्थिति यह है कि अब यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि समाजवादी वोटर, अखिलेश यादव के कहने पर बसपा या राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी को आंख बंद करके अपना वोट दे ही देंगे। इसी प्रकार बसपा भी इस तरह का कोई दावा नहीं कर सकती है। इन दलों को वोटर इस बात का अहसास पिछले कुछ चुनावों में करा भी चुके हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती तो अक्सर कहती सुनी भी गई हैं कि गठबंधन से उन्हें नुकसान होता है। उनका वोट तो गठबंधन सहयोगी को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन उन्हें इसका फायदा नहीं मिलता है। यह तर्जुबा वह पूर्व में गठबंधन करके हासिल कर चुकी हैं।

बात कांग्रेस की कि जाए तो उसे सबसे अधिक चिंता रायबेरली और खासकर अमेठी की है। लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा गठबंधन ने रायबरेली और अमेठी सीटें छोड़ने की घोषणा की है लेकिन कांग्रेस में बेचैनी बनी हुई है। अमेठी में पिछले पांच वर्षों से सक्रिय स्मृति ईरानी का पलड़ा इस बार राहुल गांधी के बराबर का लग रहा है। ईरानी यहां अभी भी पूरा समय दे रही हैं, लेकिन राहुल गांधी चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते हैं। उनके कंधों पर पूरी 543 सीटों की जिम्मेदारी है। इसके अलावा अमेठी में मोदी−योगी की रैली, भाजपा द्वारा की जा रही घेराबंदी के अलावा विकास के कार्य, सहयोगी दलों का वोट ट्रांसफर न होने की आशंका भी है। कांग्रेस संगठनात्मक कमजोरी और पार्टी में असंतोष से भी बेचैन है। कांग्रेस में अमेठी को लेकर चिंता की वजह गत विधानसभा चुनाव भी है। क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में एक भी कांग्रेस को नहीं मिल सकी थी। ऐसा तब हुआ था जबकि वह 2017 में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। तब चार पर भाजपा और एक पर सपा उम्मीदवार विजयी हुआ था। वहीं गत दिनों राहुल के करीबी माने जाने वाले हारून रशीद का प्रियंका के दौरे से पहले पार्टी छोड़ने से साबित होता है कि संगठन में सब कुछ सामान्य नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल को यहां से मात्र एक लाख वोटों से ही जीत हासिल हुई थी, तब ईरानी ने सिर्फ एक महीने की मेहनत की थी, अबकी यह पांच साल तक पहुंच चुकी है।
-अजय कुमार

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