MANT-प्रचार के दौरान अब नहीं मिलते बच्चों को झंडा बिल्ला

हरेकृष्ण गोयल.

मांट। समय और निर्वाचन आयोग की सख्ती के चलते अब चुनाव में वो रौनक नहीं रही जो अब से करीब तीन  दशक पूर्व तक हुआ करती थी। अब बच्चे भी बिल्ले पोस्टर झण्डा को तरसते हैं।

90 के दशक से पूर्व का चुनाव बेहद चिल्ल पौं का हुआ करता था,नगर,कस्बा या छोटे से गांव में लाउड स्पीकर की तेज आवाजें आम आदमी को सोने नहीं देती थीं, कस्बा के 70 वर्षीय द्वारिका प्रसाद गोयल बताते हैं,कि वो जमाना ही अलग था,सुबह हो या रात उम्मीदवारों के माइक सोने नहीं देते थे। औऱ प्रत्याशी कहीं भी कभी भी मनचाहे जो बोले जाते थे,अब तो बस उस दिन चुनाव का माहौल दिखता है। जब इलाके में कोई चुनावी सभा या रैली हो।

उस वक्त चुनाव के दौरान आम मतदाता अपनी पसंद की पार्टी का झंडा घर या प्रतिष्ठान पर बेख़ौफ़ लहराते थे,पर अब वो भी नही है।

अब नही मिलते झंडा बिल्ला

एक जमाना था कि गांवों में प्रचार की गाड़ी आते ही बच्चों का झुंड गाड़ियों के पीछे दौड़ता था,और झंडा बिल्ला, बैनर पोस्टर और पम्पलेट लेते थे,बच्चों को इससे कोई मतलब नहीं होता था कि वह बिल्ला किस पार्टी या प्रत्याशी का है,उस वक्त अजब ही नजारा होता था कि बच्चे एक साथ कई लोगों के बिल्ले कपड़ों पर लगाये होते थे।

अब प्रचार को चाहिए लग्जरी कार

पहले पुरानी जीप या दोपहिया वाहनों से प्रचार करने में कार्यकर्ता खुश रहते थे,पर समय के साथ साथ इसमें भी बदलाव हुआ अब प्रत्याशी से जुड़े छुटभैय्या नेता को भी लग्जरी कार चाहिए होती है,पिछले विधान सभा चुनाव में देखने को मिला भी था कि कई छुटभैया नेता प्रत्याशियों से केवल लग्जरी गाड़ी न मिलने से नाराज हो गए थे,वहीं गत विधान सभा चुनाव में लग्जरी गाड़ियों की इतनी डिमांड बढ़ी थी, कि एक प्रत्याशी को दूसरे प्रदेश से गाड़ियां मंगानी पड़ी थीं।

अब केवल सब्जी पूड़ी से नहीं चलता काम

एक जमाना था कि चुनाव कार्य में लगे पार्टी कार्यकर्ता या तो घर से खाना खाकर आते थे,या फिर प्रत्याशी द्वारा उपलब्ध पूरी सब्जी से गुजर कर लेते थे,पर अब कार्यकर्ताओं ने अपना टेस्ट बदल दिया है,गत विधान सभा चुनाव में कई प्रत्याशियों के कार्यालय से अटैच गुप्त भोजनालयों पर रोज अलग अलग प्रकार के व्यंजन बनवाये गए, वहीं प्रत्यशियों ने अपने खास कार्यकर्ताओं के लिए होटल या ढाबों पर व्यवस्था की गई थी।

इच्छाओं पर कुठाराघात किया टी.एन. शेषन ने

सन 90 से पहले आम आदमी बस इतना जानता था कि चुनाव को सरकार कराती है,बस नेता और अधिकारी ही चुनाव आयोग से थोड़ा बहुत परिचित थे,12 दिसम्बर 1990 को तमिलनाडु कैडर और केरल के पलक्कड़ जिला के तिरुनेले के रहने वाले वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नारायण अय्यर शेषन को जब मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया तो उन्होंने देश भर के आम और खास लोगों को निर्वाचन आयोग के होने का अहसास कराया। उन्होंने प्रत्याशियों के लिए खर्च की सीमा भी तय कर दी।तब से लेकर अब तक निर्वाचन आयोग की वही धमक कायम है,औऱ उसी के चलते अब प्रचार सामिग्री भी बेहद सीमित होकर रह गयी है।

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