डीएम और एसएसपी ने भी खेली होली
मथुरा/बरसाना,(परीक्षित कौशिक):-

होली का जिक्र हो और उसमे बरसाने की होली का जिक्र न हो ये कैसे संभव है। कहा जाता है कि इस अद्भुत और अलौकिक होली के दरम्यान सूर्य , चन्द्रमा भी ठहर जाते है और सभी देवतागण भी इस लीला के दर्शन करने के लिए उपस्थित होते है । दरअसल कृष्णकालीन होली भगवान कृष्ण की लीलाओं की पुनरावृत्ति है मान्यता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ कमर में फेंटा बांधकर राधारानी और उनकी सखियों के साथ हंसी ठिठोली करते हुए होली खेलते थे । आज भी इसी परम्परा का निर्वहन उसी कृष्णकालीनरूप में किया जाता है।

रंगीली गली आज के आंनद स्वर्ग और अपवर्ग के सुख को फीका करता मालूम दे रही है । हुरियारिनें हाथों में चमचमाती लाठियां लिए घूंघट की ओट से हुरियारों पर तड़ातड़ प्रहार कर रही हैं। हुरियारे अपनी ढालों पर इन प्रहारों को झेल कर अपने को बचा रहे है रहे । स्त्री आज उन्मुक्त है और पुरुष रक्षा आवरण के होते हुए भी असहाय होता दिख रहा है। पुरुष का नारी शक्ति के सामने समर्पण और प्रतिकार न कर पाने का यह दृश्य दुनिया को नारी तत्व की प्रधानता का सन्देश दे रहा है कि संसार मातृत्व शक्ति से द्वारा ही संचालित है। इस दृश्य को देखने के लिए देश विदेश से लाखों का जनसैलाब उमडा हुआ है।

शुक्रवार को सुबह से ही समूची राधा नगरी उत्साह और उल्लास से लबरेज दिखाई दे रही थी । देश दुनिया में विख्यात लठामार रंगीली होली का आनंद उठाने को लाखों की संख्या में श्रद्धालु उमड आए। कस्बे की हर एक गली श्रद्धालुओं के आवागमन की चहल पहल की गवाह बनी। रगीली गली में तो पैर रखने को भी जगह नहीं मिली। बालक, युवा और वृद्ध सभी का जोश देखते ही बन रहा था। सुबह से ही श्रद्धालुओं ने गहवर वन की परिक्रमा लगाना शुरु कर दिया। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु जोश व मस्ती से नाचते कूदते होली के भजन गाते चल रहे थे। श्रद्धालुओें ने एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दी। कस्बे की गलियों में खडे स्थानीय लोगों ने परिक्रमा लगा रहे श्रद्धालुओं पर गुलाल और रंग की बारिश की। श्यामा श्याम मंदिर, गोपाल जी मंदिर, राम मंदिर, सांकरी खोर, विलास गढ, गह्वर वन, रस मंदिर, मोर कुटी, राधा सरोवर, मान गढ, दानगढ और कुशल बिहारी मंदिर से होते हुए परिक्रमार्थी लाडिली जी के मंदिर में पहुंचे। मंदिर में लोगों ने राधा रानी के चरणों में गुलाल भेंट किया। हुरियारिनें सुबह से ही होली की तैयारियों में जुटी हैं। हुरियारिनों का उत्साह देखते ही बन रहा है। आखिर साल भर जिस दिन का इंतजार रहता है वो आ पहुंचा है। राधा रानी की लीलाओं में सहभागिता करने का मौका जो मिला है। खुद के भाग्य सराहती हुरियारिनें अपनी पंरपरागत पोशाक लंहगा चूनरी को पहन कर तैयार थी। कान्हा के सखा होली खेलने आते ही होंगे। दोपहर करीब दो बजे नंदगांव से हुरियारों के टोल के टोल आने शुरु हो गए। हुरियारों की जोश और उमंग देखते ही बन रही है। धोती और बगलबंदी पहने हुरियारे कंधे पर ढाल रखे हुए हैं। ससुराल आने के चाव में ज्यादातर हुरियारे अपने मुखिया के नेतृत्व में पैदल ही ढाई कोस चले आए । नंद भवन से कान्हा की प्रतीक ध्वजा के पीछे पीछे हुरियारे नाचते झूमते गाते आये ।मुख पर पसीना झलक रहा है लेकिन थकान कहीं भी दिखाई नहीं दे रही है। बरसाना में पहुंचते ही प्रिया कुंड पर सब इकठ्ठे हो गए । बरसाना के गोस्वामी समाज के मुखिया के नेतृत्व में हजारों बरसानावासी उनके स्वागत को जा पहुंचे हैं। भांग की ठंडाई में केवडा, गुलाबजल ओर मेवा घोल कर हुरियारों को पिलाई जा रही है। जो कभी भांग नहीं पीता वो हुरियारा भी आज भांग पिये बिना रह नहीं पाता। यहा पर हुरियारों ने अपने सिरों पर पाग बांधी हैं। प्रिया कुंड के घाटों पर सैकडों हुरियारे एक दूसरे के पाग बांध रहे हैं। जो छोटे बच्चे पहली बार होली खेलने आए हैं उनके पिता या दादा उनकी पाग बांध रहे है। ऐसा लग रहा है कि हुरियारा बनने की पंरपरा का अगली पीढी को उत्तराधिकार दिया जा रहा है। प्रिया कुंड पर पाग बांधने के बाद हुरियारे लाडिली जी मंदिर की ओर चल दिए है। दरसन दे निकरि अटा में ते दरसन दे गाते हुए हुरियारे मंदिर में प्रवेश कर गए। कान्हा की प्रतीक ध्वजा को मंदिर में किशोरी जी के पास रख दिया जाता है। जो इस बात का प्रतीक है कि नटवर नंद किशोर फाग खेलने के लिए बरसाना आ चुके हैं। मंदिर में दोनों गांवों के गोस्वामियों के मध्य संयुक्त समाज गायन किया गया। समाज गायन में दोनों पक्ष एक दूसरे पर प्रेम भरे कटाक्ष करने लगे। समाज गायन के बाद हुरियारे मंदिर से उतर कर रंगीली गली में आ पहुंचे। रंगीली गली में हुरियारिनें अपने द्वारों पर टोल बना कर खडी हुई है। हुरियारों ने उनको देखकर पंचम वेद के प्रचलित पदों का गायन शुरु कर दिया। जिसके बाद हुरियारिनें लाठियां लेकर हुरियारों पर पिल पडी। हुरियारों का बच के निकलना बडा मुश्किल हो गया। हुरियारिनों के लाठी प्रहारों को हुरियारों ने बडी कुशलता से अपनी ढालों पर झेलना शुरु कर दिया। एक ओर हुरियारिने पूरे जोश से लाठियां बरसा रही थी। वहीं हुरियारे किसी कुशल योद्धा की तरह सिर पर ढाल का आवरण रखे उछल उछल कर खुद को बचा रहे थे। इस आनंदपूर्ण दृश्य को देखने के लिए लाखों श्रद्धालु उमड रहे थे। लोग घंटो पहले से आस पास के मकानो की छतो, छज्जों आदि पर जमे थे कि लठामार की एक झलक देख सकें । यही है अनूठी और अलौकिक बरसाना की लट्ठामार होली जिसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता क्योंकि यह होली है ही इतनी आकर्षक कि लोग टकटकी लगाये देखते रहते है और बरबस ही कहने लगते है वाहा क्या कहने इस राधा कृष्ण की प्रेम से ओतप्रोत होली के ।






