हरेकृष्ण गोयल

रिटायर्ड प्रधानाचार्य कर रहे हैं युवाओं को जागरूक
मांट। पश्चिमी सभ्यता व हॉलीबुड,बॉलीबुड की चमक के सामने अब बृज सँस्कृति की मशहूर नोटँकी विधा की चमक फीकी पड़ती जा रही है।किसी जमाने मे नोटँकी मंचन को देखने सुनने के लिए देहात में भीड़ उमड़ पड़ती थी। वहीं नोटँकी कलाकार खासकर देहात में बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे।
एक समय ऐसा भी रिवाज चला था कि लोग विवाह शादी जैसे खुशी के मौके पर नोटंकी का आयोजन लोगों के मनोरंजन के लिए कराते थे।

बृज की इस विधा को जीवित रखने के लिए हालांकि आकाशवाणी व दूरदर्शन ने भी काफी प्रयास किये हैं।पर अब एफएम रेडियो के दौर में लोगों को नोटँकी सुनने देखने की फुर्सत भी नहीं रही है।
छोटे से गांव में जन्मे विजेंद्र लगे प्रयास में
राया ब्लाक की ग्रामपंचायत गैंयरा के मजरा सरदार गढ़ निवासी विजेंद्र सिंह उर्फ गोला वर्मा के दिल में इसकी बहुत कसक है। 65 वर्षीय श्री वर्मा करीब 45 वर्षों से नोटँकी लेखन के कार्य मे जुटे हुए हैं।1974 में उनके द्वारा लिखित सांगीत खिलता फूल और वीरों के वीरत्व का प्रकाशन हो चुका है,उसके बाद उन्होंने तमाम सांगीत व नोटँकी आकाशवाणी के लिए लिखी हैं।
एक मुलाकात के दौरान श्री वर्मा बताते हैं कि सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते एकता में अखण्डता,एड्स से बचाव,नारी शशक्तिकरण करण,के अलावा ऐतिहासिक नोटंकी राजा महेन्द्रप्रताप,महाराजा सूरज मल, समेत दर्जनों नोटँकी आकाश वाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
मंच बना कर कर रहे हैं जागरूक
श्री वर्मा कहते हैं कि उन्हें कष्ट इस बात का है कि आज का युवा इस विधा से दूर होता जा रहा है,जो कि बृज की सँस्कृति के लिए अच्छे संकेत नहीं है।इसीलिए उन्होंने इस विधा को संरक्षित करने के लिए ग्रामीण युवाओं को जागरूक करने का काम शुरू किया है।

गोला वर्मा ने बताया कि वह एक दर्जन के करीब लोगों को वह नोटँकी विधा से जोड़ चुके हैं। उनसे इस सांगीत विद्या के गुरु मन्त्र लेने के बाद ग्रामीण श्याम ने गोला वर्मा द्वारा लिखित एक सांगीत के कुछ हिस्से भी गाकर सुनाए। युवक जितेंद्र सिंह,रोहित कुमार ने बताया कि उन्होंने काफी कुछ सीखा है अब प्रयास में हैं कि जल्द ही इलाके में गोला वर्मा द्वारा रचित नोटँकी का शानदार मंचन हो।
20 मील तक जाते थे नोटँकी देखने
गांव सरदार गढ़ के 73 वर्षीय महेंद्र सिंह का कहना है,कि एक वो दिन था,जब वह बीस मील दूर भी नोटँकी देखने जाते थे।अपने जमाने की याद ताजा करते हुए वह कहते हैं कि नोटँकी मनोरंजन के साथ साथ हमें महापुरुषों की जीवनी से भी परिचित कराती थी। 60 वर्षीय श्याम सुंदर पचौरी कहते हैं कि आज के टीवी चैनलों और मोबाइल ने लोगों को नोटँकी से दूर कर दिया है।।।।।।।।
बुजुर्ग ग्रामीणों ने बताया कि पहले नोटँकी केवल राजा महाराजा या महापुरुषों के जीवन को लेकर मंचित की जाती थीं।जिसके जनक हाथरस के पंडित नथाराम थे। उस वक्त मंचित होने वाली ज्यादातर सांगीत(नोटँकी) उन्हीं के द्वारा रचित हुआ करती थीं।

राया के छैल बिहारी ने भी लिखी हैं नोटँकी
राया के छैल बिहारी लाल अग्रवाल की लिखी हुई नोटँकी 25 वर्षों से लगातार मथुरा आकाशवाणी से प्रसारित होती हैं।उन्होंने बताया कि उन्हें नोटँकी लेखन विरासत में मिला,उनके पिता पन्नालाल अग्रवाल उर्दू के शायर थे।90 वर्षीय श्री अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने चक्रव्यूह संग्राम सांगीत लिखा जो तीन मंजिल में था। जिसके संपादित अंश आकाशवाणी से प्रसारित होते रहते हैं। उन्होंने दो नाटक सीता परित्याग,व मातृ भूमि के लाल का भी कई बार मंचन हो चुका है। उनके द्वारा सैंकड़ों कविताएं,रसिया,पैरोडी,छंद, मल्हार आदि लिखे जा चुके हैं।उनका भी दर्द है कि आज आधुनिकता के दौर में लोग बृज संस्कृति की विधा से दूर होते जा रहे हैं।






