GOVARDHAN-पुलिसअंकल क्या हमारी गाड़ी का पास बनगया उपनिरीक्षक अमित भाटी ने जो प्रतिक्रिया दी सबके रौंगटे खड़े हो गये

परिक्रमा मार्ग में गाड़ी का प्रवेश पत्र लेने पहुंचेे मासूम*
(परीक्षित कौशिक)
मथुरा,:– थाना गोवर्धन कार्यालय पर काम करते हुए अचानक किसी की मधुर वाणी कानों में पड़ी पूछा कि -क्या हमारी गाड़ी का पास बन गया है ? मैंने ऊपर नजर उठाकर देखा सामने दो गोरे बच्चे खड़े थे मैं एकदम से अचंभित हो उठा और उनकी बात का जवाब ना देते हुए मैंने उन से उनका नाम पूछे बड़े ने अपना नाम रघुनाथ दास छोटे ने मोहनदास बताया ।मैंने पूछा बेटा आप इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोलते हो जब बोले कि हमारा जन्म यहीं हिंदुस्तान में हुआ है ऑल हिंदी हमारी मातृभाषा है मुझे बड़े गर्व की अनुभूति हुई उनके पिताजी से पूछा तो वह लोग यूरोप महाद्वीप के स्वीडन के रहने वाले थे जो कि अब पिछले काफी वर्षों से भारत में रह रहे हैं और भारत की नागरिकता प्राप्त कर लिए ।उन लोगों के हिंदी और हिंदुस्तान के प्रति मन में सम्मान देखकर मैं खुद सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या हमारा देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है ।क्योंकि जहां तक मैं देख रहा हूं और समझ रहा हूं हर किसी  कंपटीशन , साक्षात्कार ,एग्जाम में इंग्लिश की इंपोर्टेंस बहुत ज्यादा कर दी गई है यहां मेरा तर्क इंग्लिश से नहीं है  मेरा तर्कहिन्दी से है।  कि हम अपने समाज सामाजिकता और अपनी राष्ट्रीयता को किस दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं हम पश्चिमी सभ्यता की तरफ इतनी तेजी से अग्रसर हैं की एक दिन अपनी भारतीय सभ्यता को खोजने के लिए  किन्ही गोरे बच्चों से मेरी भांति ही बात करेंगे। हमारे लोगों की मानसिकता पर अंग्रेजी इस कदर हावी है की किसी के बुद्धिमता का परिचय उसके अंग्रेजी बोलने से लगा लिया जाता है जैसे किसी की खूबसूरती का अंदाज है उसके गोरे तन से किया जाता है ।जबकि बुद्धिमान व्यक्ति ना बोलने वाले भी होते हैं और खूबसूरत व्यक्ति  साँवले भी होते हैं। आज के समय में सबसे ज्यादा जरूरत हैतो हमें अपने बच्चों में संस्कार देने की है अपने समाज में अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान देने की है ।अगर मैं कहीं शिक्षित लोगों के बीच बैठकर किसी चर्चा में भाग लेता हूं और उस चर्चा में अपने भावों को हिंदी भाषा में प्रकट करूं तो मुझे गर्व  होना चाहिए ऐसा हर एक भारतीय के मन में जब तक नहीं आएगा तब तक हम लोग कहीं ना कहीं अपने देश में अपनों से दूरी बनाए रखेंगे ।पश्चिमी सभ्यता का ही असर है कि अब वृद्ध आश्रमों में हमारे बुजुर्गों की संख्या इतनी तेज़ी से बढ़ रही है ।हमें गर्व होना चाहिए कि जब हमारा देश का प्रधानमंत्री दूसरे देशों में जाकर हिंदी में भाषण दे सकता है तो क्यों ना हम लोग हिंदी को उस स्तर पर पहुंचा दें जहां दुनिया वाले हिंदी को सीखने के लिए आतुर हो जाएं। आज के लिए इतना ही काफी है क्योंकि अब कुछ सरकारी काम भी कर लिया जाए।
Attachments area

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*