MANT- पौष पूर्णिमा पर मानसरोवर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

रिपोर्ट- हरेकृष्ण गोयल

PDU समाचार
मांट।पौष पूर्णिमा के अवसर पर सोमवार को मानसरोवर स्थित राधा रानी मंदिर पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा।शाम तक हजारों लोग राधा रानी के दरबार में मत्था टेकने पहुंचे।

पूर्णिमा पर मानसरोवर में स्नान और राधारानी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवसर पर राधारानी का सानिध्य प्राप्त करने के लिए दूर दराज के भक्तों का रविवार से ही वहां पहुंचना शुरू हो गया।

श्रद्धालुओं के राधा रानी के जयकारों से पूरा वातावरण राधामय हो गया। तमाम लोगों ने यहां अन्नकूट का भंडारा भी किया।

श्रद्धालुओं ने मंदिर में परम्परागत सोन हलवा का प्रसाद राधा रानी को अर्पित किया। वही। मंदिर प्रशासन द्वारा व्यवस्था न किये जाने से श्रद्धालुओं को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ा।हालांकि मेला में दूर दराज से आये कई दुकानदारों ने शिकायत की कि मंदिर की ओर से उनसे दुकान लगाने के पैसे भी लिए गए हैं पर उनको दुकान भी तरीके से नहीं लगाने दी गयी है।

पिपरौली खादर स्थित राधा रानी मानसरोवर एक छोटा सा अर्ध चन्द्राकार वन है। जिसमें अति प्राचीन सिद्धपीठ राधारानी मंदिर एवं मानसरोवर नामक पवित्र कुंड स्थित है।

मूलतः यह वही स्थान है जहाँ भगवान कृष्ण गाय चराने के लिए वृन्दावन से यमुना पार करके आते थे। मान्यता है कि राधा रानी यहां इस कुण्ड के सहारे बैठकर कृष्ण वियोग में स्नान के बहाने रोती थीं। उन्हें रोते हुए कोई देख न ले इसलिए मुख पर पानी डालती जातीं थीं। इस अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान के मथुरा वृन्दावन बरसाना गोकुल गोवर्धन दाऊजी (बलदेव) की भाँति किसी भी मुख्य मार्ग से जुड़ा न होने के कारण ये सामान्य जनमानस की पहुँच से दूर ही रहा। जिसके परिणाम स्वरूप आज तक यह दिव्य स्थान सरकार एवं समाज की दृष्टि में पूर्णतः उपेक्षित रह गया।  राधारानी मंदिर में यों तो प्रत्येक पूर्णिमा को मेला लगता है ,पर कार्तिक पूर्णिमा का मेला यहां अन्नकूट मेला और हाथरस वालों के मेल के नाम से भी जाना जाता है।किदवंती है, कि यहीं पर राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने 6 मास तक तपस्या करके भगवान विष्णु का दर्शन और वरदान प्राप्त किया था। इस स्थान की दिव्यता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है की वृन्दावन में यमुना के एक किनारे पर निधिवन स्थित है जिसमें मधुवन (मानसरोवर)की ओर देखते हुए अकेले बांके बिहारी जी विद्यमान हैं। आज निधिवन शहरीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न हुए अतिक्रमण की मार से सिकुड़ गया है। जिसके फलस्वरूप बांके बिहारी मंदिर और निधिवन अलग अलग दिखते हैं जबकि बांके बिहारी मंदिर मूलतः विशाल निधिवन का ही अंग था, और यमुना के दूसरे किनारे पर मधुवन में अकेली राधारानी निधिवन की ओर देखती हुईं विद्यमान हैं। कृषि भूमि के प्रसार हेतु वनों के अवैध कटान एवं अतिक्रमण की मार से आज मधुवन भी निधिवन की ही भांति सांकेतिक वन मात्र रह गया है। कटु सत्य तो यह है कि आज मथुरा वृन्दावन के अधिकांश निवासियों तो निवासियों यहाँ तक कि अधिकांश विद्वानों तक को भी मधुवन और राधारानी के इस दिव्य स्थान के बारे में कुछ अधिक ज्ञान नहीं है। वे तो बस इतना जानते हैं की यहाँ राधा कृष्ण से रुष्ट होकर छिप जाती थी फिर कृष्ण राधा को मनाकर ले जाते थे।

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