-अपने संसाधनों से भी करते हैं विभागाध्यक्ष व्यवस्था
हरेकृष्ण गोयल
मांट।सरकारी स्कूल कॉलेजों की जो हालात है वो किसी से छुपी नहीं है पर ऐसे में कस्बा के राजकीय महाविद्यालय को देख कर ऐसा लगता है,जैसे किसी बड़े इंस्टीट्यूट ग्रुप का कॉलेज हो।उसमें भी खास है,इस कॉलेज का विज्ञान संकाय और उसमें भी रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला।

रसायन विज्ञान के एचओडी डॉ. सुरेन्द्र सिंह ने विज्ञान संकाय को तमाम तरह के बाग बगीचे से सुसज्जित किया हुआ है।वह बताते हैं,जब 2008 में उन्नाव से तबादला होकर वह इस महाविद्यालय में आये तो उन्होंने सोच लिया था,कि कुछ लीक से हट कर करना है जिससे उनके संकाय और खासकर प्रयोगशाला की अलग पहचान बन सके।सबसे पहले अपने संसाधनों और छात्रों के सहयोग से संकाय के मुख्य द्वार को बाग बगीचे से सुसज्जित किया।इसके बाद विश्वविद्यालय से उपकरणों के लिए मिलने वाले पैसों से ही उन्होंने प्रयोगशाला के लिए तमाम तरह के केमिकल भी खरीदे।
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एक महीने लगातार होते हैं प्रक्टिकल
विश्वविद्यालय की थ्योरी की परीक्षा होने के बाद एक महीने तक लगातार केवल प्रक्टिकल कराते हैं। डॉ. सुरेन्द्र बताते हैं,वह पहले प्रक्टिकल को क्लास रूम में पढ़ाते हैं। और छात्र छात्राएं जब पूरी तरह तैयार होकर आ जाते हैं, तब उनको प्रयोगशाला में प्रवेश कराया जाता है।

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अकेले ही देखते हैं पूरी व्यवस्था
महाविद्यालय पूरी तरह सरकारी होने के चलते यहां स्टाफ का सदैव टोटा रहता है। लम्बे समय से प्रयोगशाला में प्रयोगशाला सहायक व प्रयोगशाला परिचर भी नहीं है। ऐसे में खुद ही सारी व्यवस्थाओं को देखते हैं।
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सबसे ज्यादा अंक देने वाली प्रयोगशाला
डॉ. सिंह ने बताया कि गत वर्ष विश्वविद्यालय ने नियम लागू किया कि जो महाविद्यालय प्रयोगात्मक परीक्षा के पूर्णांक 50 में से 40 से ज्यादा अंक देगा उसके परीक्षार्थियों की कॉपी विश्वविद्यालय भेजनी होगी,उन्होंने काम के आधार पर 48 अंक तक दिए थे।और उन्होंने सारी उत्तर पुस्तिकाओं को विश्वविद्यालय भी भेजा आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सभी महाविद्यलयों में केवल यही एक ऐसा महाविद्यालय था,जिसकी कॉपी विश्वविद्यालय को भेजी गई थीं।
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कल्चरल प्रोग्राम में ज्यादा विश्वास नहीं
डॉ. सुरेन्द्र सिंह की रसायन संकाय में अध्ययन रत बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा खुशबू अग्रवाल व प्रथम वर्ष के छात्र ओम हरी तिवारी ने बताया कि वह नियमित रूप से कॉलेज आते हैं और नियमित रूप से क्लास भी लगती हैं।इन्होंने बताया कि डॉ. सुरेन्द्र सर् जिस तरह से प्रक्टिकल कराते हैं।उससे ऐसा लगता है कि वह छात्रों को नहीं बल्कि अपने बच्चों को सिखा रहे हैं। वहीं डॉ. सुरेन्द बताते हैं,कि राजकीय महाविद्यालय होने के चलते यहां तमाम तरह के कल्चरल प्रोग्राम आयोजित होते हैं। पर वह बहुत जरूरी कार्यक्रमों में ही अपने छात्र छात्राओं को भेजते हैं क्यों कि पढ़ाई डिस्टर्ब होती है।
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हर अतिथि को दिखाई जाती है लैब
महाविद्यालय में किसी भी खास मौके पर आने वाले अतिथियों को रसायन लैब जरूर दिखाई जाती है,क्यों कि पूरे कॉलेज स्टाफ का मानना है कि उनके जैसी रसायन लैब आसपास कहीं भी नहीं है। डॉ. सुरेन्द्र भी बताते हैं कि वह लैब की नियमित रूप से सफाई भी छात्रों की मदद से करते हैं।






