– इस बार कम रही गंगा स्नान का पर्व लेने वालों की संख्या
– गांवों में पंतगबाजी का क्रज भी दिखा गौण
पीडीयू समाचार
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मथुरा। देहात में इस बार गंगा स्नान का पर्व फीका नजर आया। लोग घरों में ही छुपे रहे। जबकि पिछले सालों में दर्जनों ग्रामीण यमुना और गंगा स्नान को घरों से सुवह ही निकल जाते थे।

शास्त्रों में गंगा दशहरा की प्राचीनकाल से ही मान्यता रही है। इस दिन पुण्य लेने के लिए ग्रामीण यमुना व गंगा स्नान को पहुंचते हैं। समय के साथ परम्पराएं भी दम तोडती नजर आ रही हैं। प्रमुख त्यौहार माना था। लगा रहत वाला गंगा पर्व इस बार सूना सूना सा नजर आया। ग्रामीणों में गंगा स्नान का क्रज न के बराबर दिखा। यही नहीं गांवों में बच्चे और युवा पंतग उडाते थे। पतंगबाजी भी गांवों में इस बार बिल्कुल नहीं दिखी। शहर में जरूर थोडी बहुत पंतगें उडती नजर आईं। यही नहीं इस दिन दानपुण्य करने वालों का भी तांता लगा रहता था। ऐसा भी कम दिखा। एक बृद्व मनोहर ने बताया कि का करै साब, जा बार सम बदलि गयौ है। पैले आदमी जमुना जाते। अब नाय । पूर्व के कुछ सालों की ओर दृष्टिपात करें तो गांवों में भी तरबजू और खरबूज के ढेर लगे रहते थे। सबसे खरीदारी इनकी इस दि नही होती थी। लेकिन
कस्बों और शहरों में ढकेलों पर जरूर तरबूज और खरबूज दिखे। फरह के गढाया, सलेमपुर, झडीपुर की खादरों में खरबूज और तरबूज की खेती करने वाले किसानों ने बताया कि अब अच्छी तरह से इसकी खेती नहीं हो पा रही है। क्यों कि यमुना में भी दिनरोज पानी की मात्रा कम होती जा रही है।
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महुअन में हरिश्चन्द्र राज मिस्त्री उडाता था पतंग
फरह। हाइवे से सटे गांव महुअन में कुछके साल पूर्व तक ग्रामीण युवाओं को पतंगबाजी का खासा शौक रहा। युवा सुवह से छतों पर दिनभर पतंग उडाते थे। दशहरा के आने से एक माह पूर्व गांवों में पतंगबाजी शुरू हो जाती थी। लेकिन समय के प्रभाव से यह शौक युवाओं में गायब 






