
मथुरा :- बाबा स्वामी हरिदास के सातवें आचार्य ललित किशोरी देव महाराज द्वारा स्थापित स्थान जो कि आज अपने प्राकृतिक सुंदरता के कारण विश्व विख्यात है उसके रहन-सहन के पारंपरिक नियमों को ताक पर रखकर और उसकी प्राचीनता को नष्ट करने का षडयंत्र चलाया जा रहा है जिससे के भविष्य में ऐसे स्थान को भी लोग एक आबादी के रूप में बसावट कर सकें पूर्व में यह स्थान जिसकी चार दिवारी बॉस की से बनाई गई थी वर्तमान प्रबंधन उन सब की अनदेखी कर लोहे के जाल और कंकरीट सीमेंट आदि से दीवारों का निर्माण कर इसकी प्राचीनता को नष्ट कर रहे हैं एक और आश्चर्यजनक बात है बाहर से कृत्रिम रोशनी की रोक के लिए दीवार बना रहे हैं और अंदर स्थान के हर कुटिया में इस रोशनी को स्थान दे रहे हैं यह एक हास्यास्पद स्थिति है जो यह दर्शाती है के वर्तमान अपने पूर्वजों की राह से भटक कर चल रहा है बजाय ईद पत्थरों की दीवाल के बांस की खड़ी करते तो वह उसकी पारंपरिक सुंदरता को दर्शाता पर विडंबना है जहां केवल पेड़ पौधे ही लगाई जानी चाहिए वहां पर हर जगह पक्का निर्माण किया जा रहा है और तो और एक स्थान के दक्षिण सामने की साइड मोहनी बाग स्थित है जिसे महाराज श्री राधा चरण दास जी द्वारा मात्र इसलिए खरीदा गया था के यहां पर कहीं आबादी आकर ना बस जाए जिससे के लगे हुए वृक्ष लताओं को काट डाले उन्हें मालूम नहीं था कि आज यह कार्य उनकी ही गद्दी पर वर्तमान में बैठे हुए महंत जी अपने ही हाथों कर देंगे हम यहां पर एक और खुलासा कर रहे हैं वर्तमान प्रबंधक इस जगह पर सारे पेड़ कटवा कर पक्का निर्माण करा रहे है जो यह दर्शाता है के पाखंड अपनी किस चरम सीमा पर पहुंच चुका है जो स्वामी श्री चरण दास जी द्वारा सोची हुई बात का एकदम विपरीत कार्य कर रहा है एक और जहां प्राचीन धरोहर को बचाने की बात की जा रही है वहीं दूसरी ओर प्रथम प्रकाश से बचने की बजाए अंडर ग्राउंड बेसमेंट में क्या बन रहा है

यह कोई नहीं जानता साथ में उसमें प्रकाश की भी व्यवस्था की जा रही है हम नहीं समझते की आसाराम बापू या राम रहीम जैसी कोई व्यवस्था तैयार हो रही हो इसका कोई नक्शा भी पास हुआ है या नहीं आज की तारीख तक मुझे मालूम नहीं मैं चाहूंगा के इसकी परमिशन अगर मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण ने दी होगी हो तो देखी जाए अन्यथा कार्य को तुरंत रुकवा कर विराजमान प्रबंधन से सवाल किया जाए दीवाल बनाने की तो कोई परमिशन नहीं ली क्या इसकी भी परमिशन की जरूरत नहीं है या यह कहें के टटिया स्थान खुद-ब-खुद एक सरकार के रूप में कार्य कर रही है जिसे किसी भी प्रकार की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है और उनके एक इशारे पर प्रशासन किसी भी चीज को मंजूरी देने के लिए तत्पर रहेगा इसमें दो ही चीज है या तो प्रशासन तंत्र भ्रष्ट है जो कानून को ताक पर रखकर इन्हें परमिशन दे देता है या यह अपनी मंजूरी स्वयं ही ले लेते हैं यह एक प्रश्न है क्या टटिया स्थान ट्रस्ट स्थान अपने ट्रस्ट मीटिंग में इन सब चीजों का अप्रूवल लेते हैं अगर हां तो उनके बजट पर अवश्य प्रश्न उठाए जाने चाहिए उनके आज तक आमदनी के क्या सूत्र हैं पता लगाना चाहिए यह सरकार का कार्य है हम यह जानते हैं इस स्थान में हर रोज तीन या चार लाख रुपए का चढ़ावा आता है और वह इसी प्रकार खर्चे करते रहता है पहले स्थान संचालित गौशाला जो बिहार वन के नाम से मशहूर थी उसमें 80 सी ली हुई थी जिससे के दानदाता रकम चेक से अदा करते थे वर्तमान प्रबंधन ने 80 सी हटा दिया और अब दानदाताओं से नकद राशि ली जाती है जिसका कहीं कोई हिसाब नहीं होता जैसा मुख्य न्यासी यानी के ट्रस्ट का अध्यक्ष चाहे पैसे खर्च करता हम इसकी समीक्षा कराएं और एक न्यायिक कमीशन बैठा कर पूरी जानकारी ले






