देवेन्द्र गोस्वामी, DDU NEWS

मथुरा। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आज हम एक ऐसी शख्सियत की चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने आधुनिकता की चकाचौंध के बीच समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का बीड़ा उठाया है। मथुरा की ताराधाम कॉलोनी निवासी डॉ. अर्चना प्रिय आर्य आज उन हजारों महिलाओं और लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहती हैं।
टूटे घरों और कुसंस्कारों ने दी ‘संस्कार जागृति’ की प्रेरणा
डॉ. अर्चना के इस सफर की शुरुआत एक गहरी टीस के साथ हुई। समाज में बढ़ते कुसंस्कारों के कारण बिखरते परिवार, नशे की गिरफ्त में फंसता बचपन और अपनों से दूर होते बुजुर्गों की पीड़ा ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। उन्होंने महसूस किया कि इन सभी समस्याओं का जड़ से समाधान केवल ‘संस्कारों की पुनस्थापना’ ही है। इसी संकल्प के साथ उन्होंने ‘संस्कार जागृति मिशन’ की स्थापना की और सनातन वैदिक संस्कृति को घर-घर पहुँचाने के अभियान में जुट गईं।
10 वर्ष की आयु से शुरू हुआ ‘वैदिक मिशन’
संस्कारों के प्रति यह प्रेम डॉ. अर्चना को विरासत में मिला। वे बताती हैं कि लगभग 28 वर्ष पूर्व उनके पैतृक गाँव ऊँचागाँव में आर्य समाज का एक कार्यक्रम हुआ था। वहाँ आए विद्वानों की ओजस्वी वाणी ने उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला। अपने पिता आचार्य सत्यप्रिय आर्य और माता सरोज रानी आर्य के मार्गदर्शन में मात्र 10 वर्ष की आयु से ही उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती की विचारधारा और वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया था।
तीन वर्षों का गहन शोध और ‘वैचारिक क्रांति’
डॉ. अर्चना ने केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी इस अभियान को पुख्ता किया। उन्होंने तीन वर्षों तक संस्कारों के महत्व और उनके सामाजिक प्रभावों पर गहन शोध किया। आज जब वह मंच से अपनी ओजस्वी वाणी में भाषण शुरू करती हैं, तो श्रोता न केवल मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, बल्कि अपने परिवारों में पुनः वैदिक संस्कारों को अपनाने का संकल्प भी लेते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में भी गाड़ा सफलता का झंडा
जन-जागरण के इस कठिन मार्ग पर चलते हुए डॉ. अर्चना ने अपनी शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने
देवभाषा संस्कृत में स्नातकोत्तर और पीएचडी (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की।
उत्तर प्रदेश असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में पूरे प्रदेश में 5वां स्थान हासिल कर अपनी मेधा का परिचय दिया।
वर्तमान में वह मेरठ के प्रतिष्ठित कनोहर लाल स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय में प्रोफेसर एवं संस्कृत विभाग की अध्यक्षा के रूप में कार्यरत हैं।
एक सशक्त संदेश
डॉ. अर्चना प्रिय आर्य का मानना है कि संस्कारों के अभाव में कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता। उनकी इस मुहिम का असर है कि आज बड़ी संख्या में युवतियां उनके साथ जुड़कर जन-जागरण के कार्य को आगे बढ़ा रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर उनका जीवन यह संदेश देता है कि एक दृढ़ निश्चयी महिला न केवल अपना भविष्य संवार सकती है, बल्कि पूरे समाज की दिशा बदल सकती है।





